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Saturday, June 1, 2019

आज का मनुज

शून्य होती भावना है
जय विजय की कामना है,
होता पराक्रम निस्पंद सा
मनोवृत्ति के द्वंद सा।

अधर्मों की वृथायें हो रही अब तेज हैं
द्वेष, ईर्ष्या, कुविचार ना हीं कभी निस्तेज हैं,
तोड़ती है दम प्रखरता बुद्धि की ही गोद में
है मनुज तल्लीन कितना, आमोद में प्रमोद में।

-
ps

Monday, August 20, 2018

End of the universe


थोड़े से करोड़ों सालों में
सूरज की आग बुझेगी जब
और राख उड़ेगी सूरज से,
जब कोई चाँद न डूबेगा
और कोई जमीं न उभरेगी |

तब ठंडे बुझे एक कोयले सा
टुकड़ा ये जमीं का घूमेगा
भटका, भटका, मद्धम खाकेस्तरी रौशनी में |

मैं सोचता हूँ उस वक़्त अगर
कागज़ पर लिखी एक नज़्म कहीं उड़ते उड़ते सूरज में गिरे
और सूरज फिर से जलने लगे |

- गुलज़ार 

Saturday, February 11, 2017

रामराज काहूँ नहीं व्यापा


तुलसीदास दिल्ली जा रहा था | एक भगत ने टिकिट ले दिया जो पहले दर्जे में बैठा था | बगल में एक संसद सदस्य थे | उन्होंने चमचों द्वारा पहनायीं गयीं मालाएं उतारीं और पसीना पोंछते हुए बोले - बड़ी मुसीबत है | लोग मुझे इतना चाहते हैं कि तंग हो जाता हूँ |

तुलसी ने कहा - आदमी को सुखी रहने के लिए दो चीजें जरुरी हैं - भ्रम और मूर्खता | वे दोनों आपमें हैं, इसलिए आप खूब सुखी हैं |

- हरिशंकर परसाई (1984-85 में पाक्षिक 'सारिका' में 'तुलसीदास' के नाम से स्तंभ लिखते थे)

Saturday, June 20, 2015

लोकतंत्र

ये जो तंत्र है
एक महान यंत्र है
ईवीएम के प्रयोग से
लगता, सभी स्वतंत्र हैं |

नहीं कोई षण्यंत्र है 
दिखता नहीं, नवीनता
आती हर पंचतंत्र है |

अपवित्रता बिल्कुल नहीं 
कहाँ से हो, जो रोज गाते 
ब्राह्मण असंख्य मंत्र हैं |

अशांति की कोई चिंता नहीं 
पंडित मौलाना, ख़ुशी से 
मिलते गले, निशस्त्र हैं |

नेतृत्व के नेता हम हीं
पूरे जगत को सीख दें
चूँकि सभी साधू-संत हैं |

कर्मण्यता का ज्ञान है 
एवं धैर्य की सीमा नहीं 
अतः, हर काम होता अनंत है |

चाचा सैम कुछ भी खोज करें 
पर ये हमारा अभियंत्र है 
यूनान को, आओ हम बताएं 
यही लोकतंत्र है, यही लोकतंत्र है |


--
ps

Friday, September 5, 2014

अर्ध सत्य


चक्रव्यूह में घुसने से पहले कौन था मैं और कैसा था
ये मुझे याद ही न रहेगा
चक्रव्यूह में घुसने के बाद मेरे और चक्रव्यूह के बीच सिर्फ जानलेवा निकटता थी
इसका मुझे पता ही न चलेगा

चक्रव्यूह से बाहर निकलने पर मैं मुक्त हो जाऊं भले ही
फिर भी चक्रव्यूह की रचना में फर्क ही न पड़ेगा
मरूं या मारूं, मारा जाऊं या जान से मार दूँ
इसका फैसला कभी न हो पायेगा

सोया हुआ आदमी जब नींद में से चलकर उठना शुरू करता है
तब सपनों का संसार उसे दोबारा देख ही ना पायेगा
उस रौशनी में जो निर्णय की रौशनी है
सब कुछ समान होगा क्या

एक पलड़े में नपुंसकता,
दूसरे पलड़े में पौरुष
और ठीक तराजू के कांटे पर
अर्ध सत्य ।


-- दिलीप चित्रे ( फिल्म 'अर्ध सत्य' की कविता )

Saturday, August 30, 2014

अर्थी की आरती


हिमाल के कपाल से
खाडी के काल तक
लेटा हुआ है एक शव
करवटें लेता, बचता बचाता
पहले फुंफकारता, फिर सुप्ताता
ऐसा लगता जैसे हो लंबी दूरी का सारथी
शायद कह रहा है - बंद करो मेरी अर्थी की आरती ।

अरे, कोई ध्यान से देखो जरा
मरा, तो आखिर कैसे मरा
सर पर गर्मी की ताप के निशान
और पैरों की उंगलियां गली हुईं
ऋषियों जैसे केश मटमैले हुए पड़े हैं
हृदय और वक्ष के संगम पर कुचले जाने की निशानियाँ जैसे सांसों को हो मारती
पर शायद कुछेक सांसें हर अंतराल पर फ़ुसफ़ुसातीं - व्यर्थ है मेरी अर्थी की आरती ।

देखो कितनी तीव्र गति से वीभत्स हुआ जाता इसका तन
शंकित ही है, इस दशा-दिशा में, बचता होगा क्षण भर जीवन
तभी अचानक उस मृत शव में हरकत आई
जैसे घंटियों की बधिर कर देने वाली टनटन से अपने कानों को बंद कर रही हो
और कहने की कोशिश कर रही हो
इन जड़बुद्धियों को कौन बताये, वैद्य हैं अपरिहार्य अभी, नाकि पंडित उमा और भारती
शीघ्र करो, तीव्र करो, वरन मेरी तो क्या, अपूर्ण ही रह जाएगी मेरी अर्थी की भी आरती ।


--
ps

Friday, August 22, 2014

जय श्री राम

अच्छा, तो हिमालय पर्वतों की तीन श्रृंखलाएं हैं - हिमाद्रि, हिमाचल और शिवालिक। 


(नेपथ्य से) "जय श्री राम, जय श्री राम"


नहीं, नहीं। राम के नाम पर कोई नहीं है। सबसे दक्षिण वाली श्रृंखला तो शिवालिक है।



"जय श्री राम, जय श्री राम"



ओह, अब समझा, ये तो अंतर्मन की आवाज नहीं बल्कि बाहरी विश्व की पुकार लगती है। चलकर देखूं, इस भारतीय भूगोल की रचना से तो ज्यादा ही रोचक होगा। 


कम से कम बीसियों की संख्या में होंगे। बड़े ही युवा साधु हैं। गेरुए वस्त्र, हाथों में मोबाइल फ़ोन, कानों में माइक्रोफोन और जिह्वा पर राम का नाम - धर्म और आधुनिकता का ऐसा मिलन तो कम ही देखने को मिलता है। लेकिन, आज क्यों? पहले तो नहीं देखा इनको। आज कोई खास दिन है? आज तो शुक्रवार है। रामनवमी बीते भी काफी दिन हो गए। जरूर कोई और पर्व होगा। तारीख कौन सी है आज ?


16 मई, 2014 


ओह!



--

ps

Wednesday, February 8, 2012

खुल रही हैं खिड़कियां


कह रहा है आसमां 
और ये सारा जहां 
तोड़ दे सब बंधनो को 
दूर है मंज़िल कहां 

उठ जाग जा के देख ले 
हो गया सवेरा नया 
आ सूर्य से नजरें मिला ले 
खुल रही हैं खिड़कियां, खुल रही हैं खिड़कियां |

सब तेरे ही हैं |

सब तेरे ही हैं |


मेरे दिल की तेज धड़कनें
जूतों की तरफ़ गड़ी हुइ मेरी नजरें
कि तुम मेरी दबी हुइ मुस्कान ना देख लो
पर तुम नाराज ना होना, क्योंकि ये

सब तेरे ही हैं |

मेरी आंखें खिसियाई सी
मेरे कान खुशी से पुलकित
तुम्हारी आवाज जो सुनी उन्होने
पर तुम नाराज ना होना, क्योंकि ये

सब तेरे ही हैं |

कुछ कहने को बेताब मेरे होंठ
जींस की जेब मे भींचे हुए मेरे हाथ
असफ़ल हैं इस कोशिश में
कि जमीन को छूते हुए तुम्हारे
फ़ूलों वाले दुपट्टे को उठा सकें
पर तुम नाराज ना होना, क्योंकि ये

सब तेरे ही हैं |